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वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 पर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी जंग शुरू, 73 याचिकाओं पर आज होगी सुनवाई

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट आज बुधवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 73 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगा। इस अधिनियम को लेकर देशभर में व्यापक विरोध और बहस छिड़ी हुई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अधिनियम मुस्लिम समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जबकि केंद्र सरकार इसे वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने के लिए जरूरी बता रही है।

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की तीन-न्यायाधीशों की पीठ आज दोपहर 2 बजे से इन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगी। याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, वाईएसआरसीपी, समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम, आम आदमी पार्टी और मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों के नेता शामिल हैं। इसके साथ ही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे प्रमुख धार्मिक संगठन भी इस कानूनी लड़ाई का हिस्सा हैं।

मुख्य आपत्तियाँ और चिंताएँ:

  1. वक्फ बोर्ड के लोकतांत्रिक ढांचे को समाप्त कर दिया गया है।
  2. गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति की अनुमति से समुदाय के आत्म-प्रबंधन के अधिकार पर हमला।
  3. ‘यूज़र वक्फ’ की अवधारणा को हटाना न्यायिक रूप से स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन।
  4. कार्यपालिका को अत्यधिक अधिकार देकर वक्फ संपत्तियों को सरकारी कब्जे में लेने का खतरा।
  5. मौखिक रूप से दान की गई या दस्तावेजविहीन संपत्तियाँ समाप्त हो सकती हैं।
  6. अनुसूचित जनजातियों को वक्फ दान करने से रोकना अधिकारों का हनन।
  7. अधिनियम में किए गए 35 से अधिक संशोधन वक्फ बोर्डों को कमजोर करने की मंशा दर्शाते हैं।

सरकारी पक्ष और समर्थन

सरकार ने इस अधिनियम को न्यायसंगत, गैर-भेदभावपूर्ण और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाला बताया है। सात राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में इस अधिनियम के समर्थन में हस्तक्षेप याचिकाएँ दायर की हैं। केंद्र ने अदालत में कैविएट भी दाखिल की है ताकि बिना उनकी बात सुने कोई आदेश न दिया जा सके।

वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिली थी। इसे लोकसभा में 288 वोटों के समर्थन और राज्यसभा में 128 वोटों से पारित किया गया।

यह मामला अब सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं रहा, बल्कि धार्मिक अधिकारों, अल्पसंख्यक समुदाय की स्वतंत्रता और सरकार की पारदर्शिता की कसौटी बन गया है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस जटिल और संवेदनशील मुद्दे पर क्या फैसला सुनाता है।

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