लखनऊ | ब्यूरो रिपोर्ट |
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में दो यादव कथावाचकों—मुकुट मणि यादव और संत सिंह यादव—के साथ हुई जातीय अपमान की घटना ने पूरे प्रदेश में आक्रोश की लहर दौड़ा दी है। इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे पिछड़े वर्गों की गरिमा पर हमला बताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज अब चुप नहीं बैठेगा।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इटावा में कथावाचक मुकुट मणि यादव और उनके सहयोगी संत सिंह यादव को कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया। उन्हें जबरन सिर मुंडवाने के लिए मजबूर किया गया और उनकी सामाजिक मान-मर्यादा के साथ खिलवाड़ किया गया। घटना को जातीय श्रेष्ठता और सामाजिक भेदभाव से जोड़ते हुए कई संगठनों और नेताओं ने निंदा की है।
अखिलेश यादव ने क्या कहा?
अखिलेश यादव ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से इस घटना पर बयान जारी किया और कहा:
“PDA समुदाय आज इस घटना के हर पीड़ित की आवाज़ बन गया है। एक कथावाचक का केवल उसकी जाति के कारण अपमान करना अमानवीय और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध मानसिकता को दर्शाता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे लोग सामाजिक समरसता की भावना को तोड़ने का काम कर रहे हैं। कलाकारों का अपमान सिर्फ व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनाओं का अपमान है।
“जो लोग कलाकारों का अपमान करते हैं, वो समाज की सहानुभूति खो बैठते हैं। उन्हें ये समझना चाहिए कि सांस्कृतिक धरोहरों को अपमानित करना खुद के अस्तित्व को नकारना है।”
PDA का मतलब सिर्फ वर्ग नहीं, एक चेतना है: अखिलेश
अखिलेश यादव ने PDA को केवल एक सामाजिक समूह नहीं, बल्कि एक “सामूहिक पीड़ा, अन्याय और जागरूकता का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि इस घटना ने साबित कर दिया है कि अभी भी समाज में गहरे स्तर पर जातीय भेदभाव और सामाजिक विषमता कायम है।
उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी इन आवाजों को ताकत देगी और ऐसे किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करेगी।
बीजेपी पर आरोप: “बाहरी तत्वों के सहारे समाज को बांटने की साजिश”
अखिलेश यादव ने सत्तारूढ़ भाजपा पर भी सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा “घुसपैठिया राजनीति” कर रही है। उत्तर प्रदेश में बाहरी तत्वों को लाकर समाज को जातीय आधार पर विभाजित करने की साजिश रची जा रही है।
“उत्तर प्रदेश की जनता इस चाल को भलीभांति समझ चुकी है। ये लोग जितना समाज को तोड़ने की कोशिश करेंगे, उतनी ही मजबूती से PDA खड़ा होगा,” अखिलेश ने कहा।
सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का सवाल
इस घटना ने सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक बहस को भी जन्म दे दिया है। सवाल उठता है कि यदि कलाकारों को उनकी जाति के आधार पर अपमानित किया जाएगा, तो समाज में समरसता कैसे स्थापित होगी? क्या भारत जैसे विविधताओं वाले देश में यह मानसिकता स्वीकार्य है?
इटावा की यह घटना न केवल दो कथावाचकों के सम्मान से जुड़ी है, बल्कि यह उस पूरी सोच पर सवाल उठाती है जो जातीय श्रेष्ठता के नाम पर दूसरों की गरिमा को कुचल देती है। अखिलेश यादव का यह बयान आगामी चुनावों से पहले PDA समुदाय को एकजुट करने का बड़ा प्रयास माना जा रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेगा।
आपके विचार क्या हैं? क्या PDA वाकई एक सामाजिक आंदोलन बन रहा है? नीचे कमेंट करें और अपनी राय साझा करें।

