✍ लेखक: अंशिका यादव| The KN NEWS | दिनांक: 5 अगस्त 2025
काशी, बनारस, वाराणसी — नाम कोई भी ले लो, लेकिन यह शहर सिर्फ ईंट-पत्थरों से बना नहीं है। यहाँ की मिट्टी में श्रद्धा है, हवा में भक्ति है, और गंगा की लहरों में वो आत्मा है जो जीवन और मृत्यु दोनों को समेटे रहती है। लेकिन आज यही गंगा रौद्र रूप में है।
शहर का दिल कहे जाने वाले घाट अब डूब चुके हैं। शीतला घाट, मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट — सभी जलमग्न हैं। मंदिरों के शिखर अब सिर्फ सिर झुकाकर देखे जा सकते हैं — क्योंकि बाकी सब कुछ पानी में विलीन हो चुका है।
गंगा नहीं, दर्द बह रहा है इस वक्त
लोगों ने कभी सोचा नहीं था कि गंगा माँ का यही रूप भी उन्हें देखना पड़ेगा।
शहर की मुख्य सड़कें अब नावों के सहारे पार हो रही हैं।
मंदिरों की घंटियाँ अब नहीं बजतीं, बस घाटों पर सन्नाटा है।
सामने घाट हो या नमो घाट — सब डूब चुके हैं।
घाटों पर पसरा सन्नाटा और प्रशासन की हड़बड़ी
राजघाट से नमो घाट तक जाने वाली सड़क पर अब लगभग एक फीट पानी है।
प्रशासन ने इसे एक तरफा यातायात के लिए खोला था, ताकि पुल पर भीड़ न हो,
लेकिन अब वो वैकल्पिक रास्ता भी बाढ़ की भेंट चढ़ गया है।
नमो घाट पर लगे भव्य “स्कल्पचर” जिन पर करोड़ों रुपये खर्च हुए थे,
आज वो भी पानी में डूबे खामोश खड़े हैं — जैसे शहर की लापरवाही को आईना दिखा रहे हों।
मणिकर्णिका घाट – जहां मृत्यु भी ठहर गई
काशी में मृत्यु भी मोक्ष का द्वार मानी जाती है,
लेकिन जब मणिकर्णिका घाट ही डूब जाए, तो क्या होगा?
लोग अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी लेकर खड़े हैं,
लेकिन घाट तक जाने का रास्ता नहीं है।
लकड़ी और नाव का किराया दोगुना हो गया है।
मानवता, मर्यादा और मृत्यु — तीनों एक साथ डगमगाती नज़र आ रही हैं।
सिर्फ वाराणसी नहीं, पूरा पूर्वांचल कांप रहा है
गाजीपुर में गंगा का जलस्तर 64.35 मीटर पहुंच गया है
(जबकि खतरे का निशान 63.10 मीटर है)।
बलिया में ये आंकड़ा 59.61 मीटर है (खतरे के निशान 57.61 से ऊपर)।
मिर्जापुर में 78.37 मीटर — मतलब खतरे के सभी निशानों को पार कर चुकी हैं नदियाँ।
ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं।
इनके पीछे वो दर्द छिपा है जो गाँवों में रहने वाले उन लोगों का है
जो अपनी ज़िंदगी बोरियों में बांधकर किसी राहत शिविर में ले जा रहे हैं।
कहाँ है स्मार्ट सिटी? कहाँ है विकास?
यह सवाल अब हर काशीवासी के मन में है।
नमो घाट को करोड़ों रुपये लगाकर “विश्वस्तरीय घाट” बनाया गया।
लेकिन पहली ही बाढ़ में वह डूब गया।
इतना ही नहीं, स्कल्पचर जो “आकर्षण” के नाम पर लगाया गया था,
वो भी अब सिर्फ तस्वीरों में दिख रहा है।
क्या यही स्मार्ट सिटी है?
क्या यही विकास है, जो पहली बारिश में बाढ़ बन जाए?
बाढ़ आई नहीं, लाई गई है
सच ये है कि यह आपदा प्राकृतिक कम, मानवजनित ज़्यादा है।
गंगा के रास्ते में अतिक्रमण, अवैध निर्माण, नालियों की खराब व्यवस्था —
सबने मिलकर इस आपदा को बुलावा दिया है।
गंगा को समेटने की बजाय उसे घेरने की कोशिश की गई,
और आज वही गंगा शहर को समेट रही है।
वरुणा और गोमती भी उफान पर
अब सिर्फ गंगा ही नहीं,
वरुणा नदी का पानी वाराणसी के 18 से अधिक मोहल्लों में घुस चुका है।
गोमती नदी भी खतरे की सीमा को पार कर चुकी है।
जिस घर में कल तक पूजा होती थी,
वहीं आज बाढ़ का पानी टेबल तक पहुंच चुका है।
प्रशासन की तैयारी – कागज़ पर ही सीमित
हां, राहत शिविर लगे हैं।
एनडीआरएफ की टीमें तैनात हैं।
ड्रोन से निगरानी की जा रही है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है।
लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा।
बच्चों को दूध नहीं मिल रहा।
बीमारों को दवा नहीं मिल रही।
और जिनका सब कुछ डूब गया,
उनके पास अब रोने के अलावा कुछ नहीं बचा।
अखबारों में नहीं, ज़िंदगी में जलस्तर बढ़ रहा है
हर घंटे गंगा का जलस्तर आधा से एक सेंटीमीटर बढ़ रहा है।
28 जुलाई से अब तक 4.84 मीटर पानी बढ़ चुका है।
और यह बढ़ना अभी रुका नहीं है।
कानपुर बैराज से जो 1.5 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया,
उसका असर अभी दो दिन और दिखेगा।
मतलब आने वाले दिन और कठिन हो सकते हैं।
श्रावण में सूने शिवालय
श्रावण मास, शिवभक्तों का महीना,
लेकिन इस बार शिव भक्त गंगा जल तक नहीं पहुंच पा रहे।
कांवड़िए नहीं दिखे, न जयकारे —
केवल गहराता पानी और बढ़ती चिंता।
काशी के बाबा विश्वनाथ मंदिर में भीड़ कम है।
क्योंकि सड़कें ही नहीं बचीं,
तो श्रद्धा कहाँ से पहुँचे?
बाढ़ के बाद बीमारी की आहट
बाढ़ आई है,
अब बीमारी आने की तैयारी है।
स्वास्थ्य विभाग ने चेतावनी दी है —
डेंगू, मलेरिया, स्किन इन्फेक्शन, पेट की बीमारियाँ —
इनका खतरा अब सिर पर है।
जिन घरों में पीने का साफ पानी नहीं,
वहाँ बीमारी का फैलना तय है।
प्रशासन ने मेडिकल टीमें तैनात की हैं,
लेकिन गांव-गांव तक पहुँच पाना आसान नहीं।
क्या काशी कुछ सीखेगी?
हर साल वाराणसी में बाढ़ आती है,
हर साल घाट डूबते हैं,
हर साल लोग पलायन करते हैं।
लेकिन हर साल चुनाव आते हैं,
वादे होते हैं, शिलान्यास होते हैं,
और फिर सब कुछ भूल जाता है —
जब तक अगली बाढ़ न आ जाए।
काश इस बार बाढ़ सिर्फ नुकसान न करे,
बल्कि सोच बदलने का कारण भी बने।
काश प्रशासन विकास की चमक से बाहर निकलकर
धरातल की सच्चाई पर काम करे।
काश हम सब गंगा को सिर्फ “माँ” न कहें,
बल्कि उसकी मर्यादा का ध्यान भी रखें।
📢 The KN News की आपसे अपील है –
यदि आप बाढ़ग्रस्त इलाके में हैं, तो सरकारी निर्देशों का पालन करें।
बिना ज़रूरत नदी के किनारे न जाएं।
किसी भी मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर 112 पर संपर्क करें।
✍ रिपोर्ट: अंशिका यादव, वाराणसी से।

