लखनऊ, 19 जून 2025 |
उत्तर प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों के मर्जर को लेकर एक बार फिर ज़बरदस्त विरोध देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार द्वारा संचालित गांवों के छोटे प्राथमिक विद्यालयों को एकीकृत करने की योजना पर अब न सिर्फ शिक्षक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है, बल्कि विपक्षी दलों ने भी इस फैसले को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
सोमवार, 18 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर #SaveVillageSchool हैशटैग ज़ोरदार तरीके से ट्रेंड करता रहा। प्रदेश के सैकड़ों शिक्षकों, अभिभावकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस अभियान में हिस्सा लेते हुए सरकार से गांवों के स्कूल बंद न करने की अपील की। हैशटैग के तहत हजारों पोस्ट हुए, जिनमें प्राथमिक शिक्षा को बचाने और ग्रामीण छात्रों के भविष्य की चिंता को प्रमुखता दी गई।
सपा प्रवक्ता मनोज काका ने साधा निशाना
इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया है। सपा प्रवक्ता मनोज काका ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा:
“गांवों के स्कूलों को बंद करके सरकार गांव की जड़ों पर वार कर रही है। ये योजना न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करेगी, बल्कि गांवों से बच्चों को शिक्षा से दूर भी कर देगी। हम इसका पुरजोर विरोध करेंगे।”
मनोज काका ने अपने वीडियो में शिक्षा विभाग और सरकार पर ‘शहरी सोच’ के चलते ग्रामीण भारत को दरकिनार करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार स्कूलों की संख्या घटाकर शिक्षा के अधिकार अधिनियम का भी उल्लंघन कर रही है।
क्या है मर्जर योजना?
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई इस योजना के तहत जिन सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या कम है या जो आसपास एक ही क्षेत्र में स्थित हैं, उन्हें मिलाकर एक बड़े स्कूल में समायोजित किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा सकेगी।
शिक्षा विभाग का कहना है कि इससे शिक्षक अनुपलब्धता की समस्या कम होगी और पढ़ाई की गुणवत्ता बेहतर होगी। लेकिन शिक्षकों और ग्रामीण समाज का एक बड़ा वर्ग इस योजना को ज़मीनी हकीकत से दूर और ग्रामीण बच्चों के हित में नहीं मान रहा।
शिक्षकों की आपत्तियां और आंदोलन
उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ समेत कई शिक्षक संगठन इस प्रस्ताव का विरोध कर चुके हैं। उनका कहना है कि:
- मर्जर से गांव के बच्चों को स्कूल तक पहुंचने में दूरी बढ़ेगी
- बालिकाओं की शिक्षा बाधित होगी
- स्थानीय स्तर पर स्कूलों का सामाजिक जुड़ाव खत्म होगा
- टीचिंग स्टाफ और संसाधनों की असमानता और भी बढ़ेगी
विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
सिर्फ समाजवादी पार्टी ही नहीं, बल्कि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और रालोद जैसे दलों ने भी इस योजना की आलोचना की है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा,
“गांवों के स्कूल बंद करना गरीब और पिछड़े वर्गों के बच्चों से शिक्षा छीनने जैसा है। सरकार को यह कदम तुरंत वापस लेना चाहिए।”
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार और शिक्षा विभाग का कहना है कि मर्जर के जरिए शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार:
“छोटे और अल्पसंख्यक छात्रों वाले स्कूलों में शिक्षक, सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई देने में कठिनाई आती है। एकीकृत स्कूलों से बच्चों को स्मार्ट क्लास, पुस्तकालय, खेल सामग्री जैसी सुविधाएं मिलेंगी।”
हालांकि अभी तक सरकार की ओर से विरोध को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है।
शिक्षा बनाम प्रशासनिक सुविधा**
सरकार और विभाग भले ही इस मर्जर को प्रशासनिक सुधार की दिशा में देख रहे हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां कर रही है। गांवों में शिक्षा सिर्फ ज्ञान नहीं, सामाजिक संरचना का आधार भी है। ऐसे में इसका विरोध सिर्फ एक नीतिगत असहमति नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस आंदोलन और सोशल मीडिया के विरोध को किस रूप में लेती है — एक मौका संवाद का या फिर एक बाधा विकास का?

