Headlines

दिल्ली विश्वविद्यालय के अफ्रीकी अध्ययन विभाग के छात्रों ने वायरल विवाद पर तोड़ी चुप्पी, कहा— यह अकादमिक मतभेद था, न कि उत्पीड़न का मामला

नई दिल्ली।
दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के अफ्रीकी अध्ययन विभाग (Department of African Studies) के शोधार्थियों और स्नातकोत्तर छात्रों ने हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक विवाद को लेकर सार्वजनिक बयान जारी किया है। छात्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जिस घटना को सोशल मीडिया पर गलत ढंग से पेश किया जा रहा है, वह किसी भी प्रकार से यौन उत्पीड़न या वित्तीय उत्पीड़न का मामला नहीं है, बल्कि यह एक कक्षा के भीतर हुआ अकादमिक मतभेद था।

छात्रों द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि यह मामला आंतरिक मूल्यांकन (Internal Assessment) और कक्षा में दिए गए प्रस्तुतीकरण (Presentation) के अंकों को लेकर छात्र और शिक्षक के बीच हुई शैक्षणिक चर्चा से जुड़ा था। छात्रों के अनुसार, प्रश्न पूछना, असहमति जताना और मूल्यांकन को लेकर संवाद करना अकादमिक जीवन का सामान्य और स्वाभाविक हिस्सा है। विश्वविद्यालय के नियमों के तहत मूल्यांकन और अंक देने का अधिकार संबंधित शिक्षक के विवेक पर निर्भर करता है।

उत्पीड़न के आरोपों से किया इनकार

बयान में छात्रों ने साफ तौर पर कहा है कि इस मामले में न तो यौन उत्पीड़न और न ही किसी प्रकार के आर्थिक उत्पीड़न का कोई आरोप है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस संबंध में किसी सक्षम प्राधिकरण के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत—न लिखित और न ही मौखिक—दर्ज नहीं कराई गई थी। छात्रों का कहना है कि सोशल मीडिया पर अधूरी और अस्पष्ट जानकारी के आधार पर जिस तरह से मामला पेश किया गया, उससे न केवल संबंधित शिक्षक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है, बल्कि पूरे विभाग और दिल्ली विश्वविद्यालय की छवि भी प्रभावित हुई है।

“कमरों” को लेकर फैलाया गया भ्रम

छात्रों ने वायरल सामग्री में “कमरों” को लेकर किए गए दावों को भी तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। बयान में कहा गया कि अफ्रीकी अध्ययन विभाग में कॉलेजों की तरह कोई साझा स्टाफ रूम नहीं हैं। प्रत्येक प्रोफेसर का अलग कार्यालय है और छात्रों को सभी शिक्षकों के कार्यालयों तक वैध शैक्षणिक पहुंच होती है। इस सामान्य अकादमिक व्यवस्था को संदेहास्पद ढंग से प्रस्तुत करना अनावश्यक भय और भ्रम पैदा करता है।

शिकायत तंत्र को दरकिनार करने पर आपत्ति

छात्रों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि विश्वविद्यालय में मौजूद औपचारिक शिकायत और grievance redressal mechanisms का उपयोग किए बिना सीधे सोशल मीडिया का सहारा लिया गया। बयान में कहा गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में शिकायतों के निपटारे के लिए पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इन प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सोशल मीडिया पर वीडियो या ऑडियो सामग्री प्रसारित करना न्यायिक प्रक्रिया और संस्थागत मर्यादाओं को कमजोर करता है।

सोशल मीडिया ट्रायल की निंदा

छात्रों ने अस्पष्ट या संपादित ऑडियो-वीडियो क्लिप्स के प्रसार और उसके आधार पर शिक्षकों व विश्वविद्यालय के खिलाफ चलाए जा रहे “सोशल मीडिया ट्रायल” की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि अधूरी जानकारी पर आधारित सार्वजनिक lynching न केवल अनैतिक है, बल्कि यह शिक्षा संस्थानों के स्वस्थ अकादमिक माहौल के लिए भी घातक है।

अंत में छात्रों ने अपील की कि किसी भी विवाद को तथ्यों, संस्थागत प्रक्रियाओं और संवाद के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर अपुष्ट आरोपों और अटकलों के जरिए।

Don’t miss these tips!

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.

2 thoughts on “दिल्ली विश्वविद्यालय के अफ्रीकी अध्ययन विभाग के छात्रों ने वायरल विवाद पर तोड़ी चुप्पी, कहा— यह अकादमिक मतभेद था, न कि उत्पीड़न का मामला

  1. तथ्यात्मक और निष्पक्ष जानकारी साझा करने के लिए “द केएन न्यूज” का आभार।

Leave a Reply to digital banking Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *