संभलजामा मस्जिद पर पेंटिंग के कार्य को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने फिलहाल मस्जिद पर पेंटिंग का काम न करने का आदेश दिया है, लेकिन मस्जिद की सफाई और रखरखाव की अनुमति दी है। यह निर्णय भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, जिसमें कहा गया कि मस्जिद एक संरक्षित स्मारक है और इसकी मौजूदा पेंटिंग की स्थिति अच्छी है।
मामला क्या था?
संभल जामा मस्जिद की समिति ने रमज़ान के दौरान मस्जिद की दीवारों और अन्य हिस्सों की पेंटिंग करने की अनुमति मांगी थी। उनका कहना था कि रमज़ान के दौरान मस्जिद को और सुंदर बनाने के लिए यह पेंटिंग जरूरी है। इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) से मस्जिद की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
ASI की रिपोर्ट
तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा कि संभल जामा मस्जिद एक ऐतिहासिक और संरक्षित स्मारक है, जिसे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मस्जिद की मौजूदा पेंटिंग की स्थिति अच्छी है और इसमें किसी प्रकार के बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने ASI की रिपोर्ट के आधार पर यह निर्णय लिया कि मस्जिद की सफाई और रखरखाव किया जा सकता है, लेकिन पेंटिंग का काम फिलहाल नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने मस्जिद समिति को 4 मार्च तक आपत्तियाँ दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद सभी पक्षों की आपत्तियाँ सुनने के बाद पेंटिंग के बारे में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण
संभल जामा मस्जिद को एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है, और यह मस्जिद भारतीय संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस फैसले से यह साफ हो गया कि किसी भी संरक्षित स्मारक पर कोई भी बदलाव या काम करते समय उसके ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि मस्जिद की संरचना और ऐतिहासिक महत्व को नुकसान न पहुंचे, और इसे पूरी तरह से संरक्षित किया जाए।
आगे की प्रक्रिया
अब मस्जिद समिति को अपने आपत्तियाँ 4 मार्च तक दाखिल करनी होंगी। इसके बाद कोर्ट सभी पक्षों की बात सुनकर पेंटिंग के बारे में अंतिम निर्णय लेगा। मस्जिद समिति और आम जनता की नजरें अब इस फैसले पर टिकी हैं, और सभी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि अंतिम निर्णय क्या होगा।
यह निर्णय ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिहाज से अहम है, और यह दर्शाता है कि अदालतें देश की सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए संवेदनशील और जिम्मेदार तरीके से काम करती हैं।

