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“फर्जी डॉक्टर” बना मौत का सौदागर: दमोह से प्रयागराज तक की 20 साल पुरानी धोखाधड़ी की कहानी

जब डॉक्टर भरोसे की जगह खौफ बन जाए

मध्य प्रदेश का छोटा-सा जिला दमोह, हाल ही में पूरे देश की सुर्खियों में तब आ गया जब एक फर्जी डॉक्टर की करतूतों ने सात लोगों की जान ले ली। यह कोई मामूली धोखा नहीं था – एक शातिर व्यक्ति ने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित हृदय रोग विशेषज्ञ की पहचान चुराकर 20 वर्षों तक तीन राज्यों में न केवल मरीजों का इलाज किया, बल्कि गंभीर ऑपरेशन भी किए। वह न केवल मरीजों को धोखा दे रहा था, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र और सरकारी योजनाओं को भी चूना लगा रहा था।

जब ‘डॉ. एन. जॉन कैम’ दमोह पहुंचे

दिसंबर 2024 में दमोह के मिशन अस्पताल में एक नई नियुक्ति हुई – “डॉ. एन. जॉन कैम”, जो खुद को लंदन के प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट बताकर पेश कर रहे थे। अस्पताल प्रबंधन ने बिना किसी ठोस सत्यापन के न केवल उन्हें नियुक्त कर लिया, बल्कि आठ लाख रुपये प्रति माह का वेतन भी निर्धारित कर दिया। डॉक्टर को आयुष्मान भारत योजना के तहत आने वाले गरीब मरीजों का इलाज करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

मौतें जो सवाल बन गईं

केस 1: रहीसा बेगम (63)
9 जनवरी को सीने में दर्द की शिकायत के बाद रहीसा को मिशन अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर “कैम” ने बिना पर्याप्त जांच के एंजियोप्लास्टी की सलाह दी। 15 जनवरी को ऑपरेशन हुआ और आधे घंटे में रहीसा की मौत हो गई। डॉक्टर ने बताया – “सर्जरी के दौरान दूसरा हार्ट अटैक आया था”।

केस 2: मंगल सिंह
4 फरवरी को भरतला गांव के मंगल सिंह को भी अस्पताल लाया गया। ऑपरेशन से पहले डॉक्टर से न परिजन मिले, न बाद में। कुछ घंटों में ही मंगल सिंह की भी मृत्यु हो गई।

अब तक की जांच में सामने आया है कि फर्जी डॉक्टर की निगरानी में हुई चार सर्जरी में से तीन मरीजों की मृत्यु हो चुकी है।


खुलासा कैसे हुआ?

कहानी तब मोड़ी लेती है जब बरी गांव के कृष्णा पटेल अपने दादा के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे। वहां एंजियोग्राफी के नाम पर 50,000 रुपये मांगे गए। जब कृष्णा ने सवाल उठाए, तो डॉक्टर ने अभद्रता की और इलाज से मना कर दिया। शक होने पर कृष्णा ने जबलपुर में इलाज कराया और डॉक्टर “कैम” की जांच पड़ताल शुरू कर दी।

कृष्णा ने नरसिंहपुर और जबलपुर से दस्तावेज एकत्रित कर बाल आयोग के अध्यक्ष दीपक तिवारी को शिकायत की। प्रशासन ने जब जांच शुरू की, तब तक डॉक्टर फरार हो चुका था।


20 साल की धोखाधड़ी की परतें

पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी नरेंद्र विक्रमादित्य यादव ने पहली बार 2006 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में “डॉ. कैम” बनकर काम किया था। यहां तक कि विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर राजेंद्र शुक्ल का इलाज भी किया। इसके बाद हैदराबाद और नरसिंहपुर जैसे स्थानों पर भी इसी नाम से फर्जीवाड़ा किया।

उसने विभिन्न जगहों पर अपनी पहचान डॉक्टर के रूप में स्थापित की और अनगिनत मरीजों का इलाज किया।


कैसे पकड़ा गया नरेंद्र विक्रमादित्य यादव?

12 फरवरी को अस्पताल से इस्तीफा देकर वह भाग गया। पुलिस की साइबर टीम ने प्रयागराज में उसकी लोकेशन ट्रैक की। उसके मोबाइल की कॉल लिस्ट से एक चिकन विक्रेता का नंबर मिला, जिससे व्हाट्सएप चैट के जरिए उसकी सटीक लोकेशन ओमेक्स अदनानी बिल्डिंग, प्रयागराज में मिली।

पुलिस ने रात 11:30 बजे उसे गिरफ्तार कर दमोह लाया। रातभर उससे एसपी श्रुत कीर्ति सोमवंशी ने पूछताछ की। हालांकि अभी तक इस पूछताछ के विस्तृत परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।


चोरी, धोखाधड़ी और हत्या की धाराएं दर्ज

  • धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2), 3(5)
  • मप्र आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम 1987 की धारा 24
  • आरोपी पर पोर्टेबल इको मशीन चोरी करने का आरोप भी है, जिसकी कीमत लगभग 7 लाख रुपये है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दखलअंदाजी

7 अप्रैल को तीन सदस्यीय मानवाधिकार आयोग की टीम दमोह पहुंची। टीम ने ऑपरेशन के दस्तावेज देखे, पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और प्रशासनिक अधिकारियों से चर्चा की। टीम 9 अप्रैल तक दमोह में रहकर रिपोर्ट तैयार करेगी।


अस्पताल प्रशासन की लापरवाही पर सवाल

  • फर्जी डिग्री का सत्यापन क्यों नहीं हुआ?
  • इतनी बड़ी सैलरी बिना जांच के कैसे स्वीकृत हुई?
  • आयुष्मान योजना के तहत मरीजों से पैसे क्यों लिए गए?

इस पूरे मामले ने सरकारी और निजी अस्पतालों की नियुक्ति प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है।


जब सिस्टम ही सवालों के घेरे में हो

दमोह फर्जी डॉक्टर कांड सिर्फ एक व्यक्ति की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि भारत के स्वास्थ्य तंत्र की जमीनी सच्चाई का आईना है। जहां मरीज इलाज के लिए अस्पताल आते हैं और मौत के घाट उतर जाते हैं। यह घटना बताती है कि यदि नियुक्ति प्रक्रियाएं और सत्यापन मजबूत न हों, तो एक धोखेबाज़ पूरे तंत्र को ध्वस्त कर सकता है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि पीड़ितों को कब न्याय मिलेगा, और क्या भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था इस घटना से कोई सबक लेगी?

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