“जीवनभर जिनके लिए जिया, उन्हीं अपनों ने अंतिम समय में साथ छोड़ दिया।”
गाजीपुर ज़िले के कासिमाबाद क्षेत्र से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां 85 वर्षीय बुजुर्ग गौरीशंकर गुप्ता का अंतिम संस्कार उनके परिवार के बजाय वृद्धाश्रम के वृद्धजनों द्वारा किया गया। तीन बेटे, दो बेटियां, बहुएं, दामाद, पत्नी और पोते-पोतियों से भरे पूरे परिवार के बावजूद इस बुजुर्ग को नसीब नहीं हुआ अपनों का कंधा।
जीवन की अंतिम यात्रा अकेले
गौरीशंकर गुप्ता, जो कभी गल्ला व्यापारी थे, का जीवन कभी रौनक से भरा था। उन्होंने अपने बच्चों को पाला-पोसा, पढ़ाया, और सबकी शादियां करवाईं। आज उनके सभी बच्चे दिल्ली में अपने-अपने परिवारों के साथ रहते हैं। परंतु जब बुढ़ापे की मार पड़ी, व्यापार में घाटा हुआ, और बदनामी घर तक पहुंची—तो वही अपने उन्हें बोझ समझने लगे।
बकाया रकम वसूलने के लिए लोग घर पर आने लगे। बेटे-बहुओं ने तानों से शुरुआत की और अंत में उन्हें घर से निकाल दिया। 8 वर्ष पहले वे ससुराल जंगीपुर आए, पर वहां भी सहारा न मिला। अंततः 2019 में एक सज्जन की मदद से उन्हें गाजीपुर के वृद्धाश्रम में शरण मिली।
“मर जाएं तो भी मत बताना” — पत्नी की बेरुखी
वृद्धाश्रम के लोगों के अनुसार, पांच दिन पहले गौरीशंकर की पत्नी अपने मायके आई थीं और जाते समय कह गईं—“अगर वो मर भी जाएं तो भी हमें मत बताना।”
25 मई को जब गौरीशंकर ने अंतिम सांस ली, तब इस बात की पुष्टि उनके साले ने की, जो सूचना मिलने पर वृद्धाश्रम पहुंचे थे।
वृद्धाश्रम बना परिवार
इस घटना के बाद वृद्धाश्रम के 58 वृद्धजनों की आंखें नम हो गईं। आश्रम में मौजूद महिलाओं और अध्यक्ष ज्योत्सना सिंह ने उनके अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने न केवल अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया, बल्कि उन्हें कंधा भी दिया।
ज्योत्सना सिंह ने बताया, “हर मां-बाप ने तीन-तीन, चार-चार बच्चों को पाला है। लेकिन यहां रहने वाले अधिकतर वृद्धजनों के बच्चे मिलने तक नहीं आते। ऐसे में हम ही एक-दूसरे का परिवार बन जाते हैं।”
“30-35 साल से कोई नाता नहीं रहा” — साले का बयान
गौरीशंकर के साले विजय शंकर गुप्ता ने बताया कि मृतक का अपने बच्चों और पत्नी से बीते 30-35 वर्षों से कोई संबंध नहीं रहा। “मैं सूचना मिलने पर गया था और वृद्धाश्रम वालों के साथ अंतिम संस्कार में शामिल हुआ,” उन्होंने कहा।
सामाजिक सवालों के घेरे में परिवार
इस हृदयविदारक घटना ने समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या बुजुर्गों की जिम्मेदारी सिर्फ वृद्धाश्रमों की रह गई है?
- क्या आधुनिकता और व्यस्त जीवनशैली ने संवेदनाओं को निगल लिया है?
- क्या संपन्नता की होड़ में रिश्ते पीछे छूटते जा रहे हैं?
गौरीशंकर गुप्ता की अंतिम यात्रा भले ही अपनों के बिना हुई, लेकिन वृद्धाश्रम के लोगों ने यह साबित कर दिया कि इंसानियत और संवेदनाएं अब भी जीवित हैं—बस अपनों से ज़्यादा अनजान अपनापन निभा रहे हैं।

