लखनऊ | ब्यूरो रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश में विकास कार्यों की रफ्तार तेज हुई है, लेकिन इसके साथ ही राज्य पर कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक राज्य पर कुल ऋण 9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति पर औसतन ₹37,500 का कर्ज है।
पांच साल में तीन लाख करोड़ बढ़ा कर्ज
राजकोषीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में यूपी पर कुल ऋण 5.64 लाख करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 7.76 लाख करोड़ तक पहुंच गया। वित्त वर्ष 2025-26 तक इसके 9.03 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होने की संभावना जताई जा रही है।
| वित्त वर्ष | कुल ऋण (करोड़ रुपये में) |
|---|---|
| 2020-21 | 5,64,089 |
| 2021-22 | 6,21,836 |
| 2022-23 | 6,71,134 |
| 2023-24 | 7,76,783 |
| 2024-25 | 8,46,096 |
| 2025-26 | 9,03,924 (अनुमानित) |
घाटा नियंत्रण में, लेकिन दबाव भी बढ़ा
राजकोषीय घाटे की स्थिति फिलहाल बेहतर मानी जा रही है। वित्त आयोग के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में यूपी का अनुमानित राजकोषीय घाटा करीब 91,400 करोड़ रुपये रहेगा, जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 2.97% है। यह आंकड़ा केंद्र सरकार द्वारा तय 3% की सीमा के भीतर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित और नियंत्रित घाटा हमेशा नकारात्मक नहीं होता। यदि उधारी का उपयोग सड़क, बिजली, जल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अवसंरचनात्मक योजनाओं पर किया जाए तो यह भविष्य में विकास को गति देता है और राजस्व बढ़ाने में मदद करता है।
कर्ज को लेकर विशेषज्ञों की राय
- वित्त आयोग का दृष्टिकोण: कर्ज का बढ़ना विकास का संकेतक भी हो सकता है, क्योंकि अधिक खर्च का मतलब बुनियादी ढांचे में निवेश है।
- शर्तें: उधारी पारदर्शी नीतियों और ठोस पुनर्भुगतान योजना के साथ होनी चाहिए, अन्यथा ब्याज भुगतान का बोझ राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है।
- खतरे: अत्यधिक ऋण से भविष्य में ब्याज अदायगी का बोझ बढ़ेगा और विकास योजनाओं पर खर्च प्रभावित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश का बजट पिछले पांच सालों में लगभग दोगुना हो गया है। औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास में तेजी आई है, लेकिन इसके साथ ही कर्ज की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लिए गए ऋण का अधिकतम उपयोग पारदर्शी और उत्पादक योजनाओं में किया जाए, ताकि आने वाले समय में यह बोझ प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव न डाले।

