लखनऊ ब्यूरो | 22 अगस्त 2025
दिल्ली में आयोजित निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन ने उत्तर प्रदेश और बिहार की सियासत में नए समीकरणों की आहट दे दी है। पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले भाजपा के सहयोगी दल—सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस)—ने मंच साझा कर यह स्पष्ट कर दिया कि उनका मकसद सिर्फ विपक्ष पर प्रहार करना नहीं, बल्कि आने वाले पंचायत और विधानसभा चुनावों में भाजपा पर सीटों के बंटवारे का दबाव बढ़ाना है।
अधिवेशन से निकलता संदेश
इस अधिवेशन में सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर, निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद और अपना दल (एस) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशीष पटेल एक साथ नजर आए। तीनों नेताओं ने पिछड़े वर्गों की उपेक्षा का मुद्दा उठाते हुए भाजपा पर दबाव बनाने की कवायद शुरू कर दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इनका असली मकसद अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले का जवाब देने से ज्यादा 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है।
बिहार चुनाव पर भी नजर
दिल्ली अधिवेशन की खासियत यह रही कि यहां बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर भी रणनीति दिखाई दी।
- सुभासपा और निषाद पार्टी ने पहले ही बिहार में चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी।
- अधिवेशन के मंच से निषाद पार्टी ने बिहार में चुनाव लड़ने का आधिकारिक ऐलान भी कर दिया।
- वहीं, अपना दल (एस) भले ही चुप है, लेकिन बिहार में विकल्प तलाशने की कवायद से इनकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा को मिला सीधा संदेश
यह अधिवेशन दरअसल भाजपा को एक राजनीतिक चेतावनी देने जैसा था। भाजपा के सहयोगी ये छोटे दल चाहते हैं कि—
- यूपी में पंचायत और विधानसभा चुनावों में उन्हें अधिक सीटें मिलें।
- पिछड़ों के आरक्षण और हक की लड़ाई में भाजपा भी खुलकर समर्थन करे।
- बिहार की राजनीति में भी उन्हें हिस्सेदारी दी जाए।
जातीय समीकरण का दांव
यूपी और बिहार दोनों राज्यों में जाति-आधारित राजनीति का गहरा असर है। हर चुनाव से पहले जातीय आधार पर एकजुटता दिखाना और मुद्दों को हवा देना इन दलों की रणनीति रही है। इसका फायदा इन्हें सत्ता में प्रतिनिधित्व के रूप में भी मिलता रहा है। यही कारण है कि इस बार भी राजभर-निषाद-अपना दल (एस) की त्रिमूर्ति ने भाजपा के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।
दिल्ली में हुआ यह अधिवेशन सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाजपा के लिए 2027 के चुनावी परिदृश्य का ट्रेलर है। स्पष्ट संकेत है कि सहयोगी दल अब भाजपा के साथ समझौते की राजनीति करने के बजाय दबाव की रणनीति अपनाने लगे हैं। यूपी के पंचायत चुनाव और 2027 का विधानसभा चुनाव इसका असली मैदान साबित होंगे।

