गाज़ीपुर : पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में सच्चाई को उजागर करना, जनता की आवाज को शासन तक पहुंचाना और निष्पक्ष खबरें प्रस्तुत करना है। लेकिन आज जिस तरह से मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर स्थानीय समाचार चैनलों तक के पत्रकारों पर पक्षपात, राजनीतिक गठजोड़ और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, वह न केवल चिंता का विषय है बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर कर रहा है।
पत्रकारिता का बदलता स्वरूप
एक समय था जब पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर सच को सामने लाने के लिए संघर्ष करते थे। लेकिन वर्तमान दौर में मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बड़ी मीडिया कंपनियां राजनीतिक दलों और बड़े उद्योगपतियों के प्रभाव में आकर निष्पक्षता खो चुकी हैं। इसके परिणामस्वरूप, पत्रकारिता का मूल उद्देश्य कहीं न कहीं धूमिल हो रहा है।
आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा दलाली का माध्यम बन चुका है। टीआरपी और विज्ञापन की दौड़ में समाचार चैनल सनसनीखेज और एकतरफा खबरें परोसने लगे हैं। कई पत्रकार और संपादक खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं ताकि वे सत्ता पक्ष या किसी खास समूह को फायदा पहुंचा सकें। यह न केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है बल्कि आम जनता को भ्रमित भी करता है।
मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल
- राजनीतिक गठजोड़: कई बड़े मीडिया हाउस किसी न किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में खबरें प्रसारित करते हैं। निष्पक्षता की जगह आज पत्रकारिता राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गई है।
- कार्पोरेट और पूंजीपतियों का प्रभाव: कई बड़े उद्योगपति समाचार चैनलों के मालिक हैं, जिससे खबरें उनके व्यावसायिक हितों के अनुसार गढ़ी जाती हैं। आम जनता से जुड़े मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं और केवल उन्हीं खबरों को प्राथमिकता दी जाती है जो मालिकों के स्वार्थ की पूर्ति करें।
- पैसे लेकर खबरें छापने का चलन: “पेड न्यूज़” की समस्या आज मीडिया जगत की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। कई बार चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर उनके पक्ष में खबरें चलाई जाती हैं, जिससे जनता तक सही जानकारी नहीं पहुंच पाती।
- लोकल मीडिया का गिरता स्तर: स्थानीय समाचार चैनलों की हालत और भी चिंताजनक है। कई बार देखा जाता है कि छोटे स्तर के पत्रकार पैसे या व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी पक्ष की खबरें चलाने लगते हैं। भ्रष्टाचार, माफियाओं और राजनीतिक दबाव के कारण कई पत्रकार सच्चाई से समझौता कर लेते हैं।
गाज़ीपुर में पत्रकारिता के नाम पर दलाली:
गाज़ीपुर जैसे छोटे शहरों में भी मीडिया का गिरता स्तर साफ तौर पर देखा जा सकता है। यहां कुछ स्थानीय पत्रकारों ने पैसे लेकर खबरें छापने का काम शुरू कर दिया है। उदाहरण के तौर पर, गाज़ीपुर में कुछ पत्रकारों पर आरोप हैं कि वे अस्पतालों के मालिकों को परेशान कर रहे हैं और जब उनसे धन प्राप्त नहीं होता, तो उनके खिलाफ झूठी खबरें प्रकाशित करते हैं। इसके अलावा, यह पत्रकार थाने में भी दलाली कर रहे हैं, जहां वे छोटे अपराधियों से पैसे लेकर उनके खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं करने या मामले को दबाने के लिए काम कर रहे हैं। विपक्ष बार-बार इन पत्रकारों की पत्रकारिता पर सवाल उठा रहा है, यह कहकर कि इस तरह की कार्रवाई समाज के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।
क्या किया जा सकता है?
- स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जाए।
- मीडिया नियामक संस्थाओं को सख्ती से काम करना चाहिए।
- पैसे लेकर खबरें छापने वालों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
- जनता को भी जागरूक होकर सही और गलत खबरों में फर्क करना आना चाहिए।
- डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों को समर्थन देना चाहिए, ताकि वे बिना दबाव के सच्ची खबरें ला सकें।
अगर पत्रकारिता ईमानदारी से की जाए, तो यह समाज में बड़े बदलाव ला सकती है। लेकिन जब पत्रकारिता दलाली में बदल जाए, तो यह जनता के साथ धोखा होता है। आज की स्थिति में जरूरत इस बात की है कि मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो और वे निष्पक्ष, पारदर्शी और सच्ची पत्रकारिता को प्राथमिकता दें। पत्रकारिता का मकसद सत्ता का भोंपू बनना नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनना है।

