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टीआरपी के भूखे चैनल्स और युद्ध जैसी स्थिति में फैलती फेक न्यूज़: कहाँ है जिम्मेदार पत्रकारिता?

प्रकाशन तिथि: 10 मई 2025 | विशेष रिपोर्ट: The KN News विश्लेषण डेस्क

बीती रात भारत के टेलीविजन चैनलों पर जो कुछ भी प्रसारित हुआ, उसे देखकर एक सवाल ज़रूर उठता है — क्या हम वाकई पत्रकारिता देख रहे थे या एक टीआरपी संचालित कल्पना की दुनिया में जी रहे थे?

जहाँ कुछ चैनलों ने पाकिस्तान के इस्लामाबाद पर कब्जा करवा दिया, वहीं कुछ ने नौसेना द्वारा कराची पर हमला करवा दिया। किसी ने राजौरी में फिदायीन हमला दिखा दिया तो किसी ने लाहौर को तबाह होते दिखाया — और इन सबमें कॉमन बात ये थी कि किसी भी खबर की कोई पुष्टि नहीं थी, सिर्फ “सूत्रों के हवाले से” ये भ्रामक खबरें फैलाई जा रही थीं।

सूत्रों के नाम पर राष्ट्र को भ्रम में डालना

पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है — पुष्टि के बाद ही प्रसारण। लेकिन बीती रात इस सिद्धांत को खुलेआम कुचला गया। चैनल्स ने बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के एक युद्ध जैसी भयावह स्थिति का माहौल बना दिया, जिसके चलते आम जनता में दहशत फैल गई।
इन चैनलों पर वीडियो गेम्स की फुटेज, अफगानिस्तान या गाजा जैसे इलाकों की क्लिपिंग और पुरानी मिलिट्री फाइल फुटेज को ब्रेकिंग न्यूज की तरह परोसा गया।

फेक राष्ट्रभक्ति का नाटक

यह विडंबना ही है कि ये चैनल्स, जो ख़ुद को राष्ट्रभक्त बताते नहीं थकते, दरअसल राष्ट्र की सुरक्षा को ही खतरे में डाल रहे हैं। युद्ध जैसी स्थिति में जब सेना हर कदम पर रणनीतिक संयम बरत रही हो, तब देश के बड़े मीडिया हाउस ‘कराची तबाह’, ‘इस्लामाबाद पर कब्जा’, ‘पाकिस्तानी सेना में तख्तापलट’ जैसी झूठी खबरें चला रहे हों — ये देशभक्ति नहीं, देशद्रोह के बराबर है।

सरकार और IB मंत्रालय की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I\&B Ministry) की निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में है। क्या युद्ध जैसी संवेदनशील स्थिति में सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसे चैनलों पर रोक लगाई जाए? क्या ऐसे समय में ब्रॉडकास्ट को नियंत्रित करने के लिए कोई आपात गाइडलाइन लागू नहीं होनी चाहिए?

जिम्मेदार एंकर्स या फेक न्यूज़ ब्रांड एंबेसडर?

विशेष रूप से अंजना ओम कश्यप और श्वेता सिंह जैसे एंकर्स, जिनका देशभर में प्रभाव है, यदि वह बिना पुष्टि के युद्ध की झूठी खबरें फैलाएं, तो यह सिर्फ टीआरपी का अपराध नहीं, बल्कि जन मानस में आतंक फैलाने का प्रयास है। ऐसे पत्रकारों को मीडिया से बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी है।

जनता को करना होगा जागरूक

आज सोशल मीडिया पर जागरूक नागरिक इस गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। अब समय आ गया है कि जनता खुद तय करे कि वह किस चैनल को देखे और किससे बायकॉट करे।

आज पत्रकारिता एक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ सच्चाई, जिम्मेदारी और राष्ट्रहित है, तो दूसरी तरफ टीआरपी, सनसनी और झूठ। यह चुनना अब सिर्फ मीडिया हाउस की जिम्मेदारी नहीं, हमारी भी है

अपील: जब तक सरकार या सेना का आधिकारिक बयान ना आए, तब तक किसी भी खबर को अंतिम सत्य मानकर दहशत में न आएं। ऐसे चैनलों से सावधान रहें जो युद्ध को तमाशा बनाकर आपके डर से पैसा कमा रहे हैं।

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