लेखक: The KN NEWS टीम
तारीख: 26 सितंबर 2025
लद्दाख, जिसे अक्सर हिमालय का हृदय कहा जाता है, पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर सुर्खियों में रहा है। हाल ही में यहां छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य की मांग को लेकर चला शांतिपूर्ण आंदोलन अचानक हिंसक हो गया। चार लोगों की मौत, कई घायल, भाजपा कार्यालय में आगजनी और अनिश्चितकालीन कर्फ्यू ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया। केंद्र ने इसके लिए सामाजिक कार्यकर्ता और जलवायु संरक्षक सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई आंदोलन की जड़ें सिर्फ राजनीतिक साज़िश हैं या यह लद्दाख की जनता की वर्षों पुरानी पीड़ा का विस्फोट है?
हिंसा तक का सफर: कब और कैसे भड़की आग?
10 सितंबर से सोनम वांगचुक और लद्दाख एपेक्स बॉडी (LAB) के नेताओं ने 35 दिन के अनशन का ऐलान किया था। भूख हड़ताल में कुछ कार्यकर्ताओं की तबीयत बिगड़ने के बाद 24 सितंबर को लेह बंद का ऐलान हुआ। बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरे, प्रदर्शनकारियों ने भाजपा और हिल काउंसिल कार्यालय की ओर मार्च किया। पुलिस और सुरक्षाबलों ने रोकने की कोशिश की, लेकिन झड़पें बढ़ गईं। देखते-देखते पथराव, आगजनी और हिंसा फैल गई।
- चार लोगों की मौत
- 80 से ज्यादा घायल
- भाजपा कार्यालय को नुकसान
- कर्फ्यू और इंटरनेट बंद
सोनम वांगचुक कौन हैं और क्यों हैं निशाने पर?
सोनम वांगचुक सिर्फ लद्दाख के नहीं बल्कि देश-दुनिया में जाने-माने नाम हैं।
- वे इंजीनियर, पर्यावरणविद और शिक्षा सुधारक हैं।
- 2009 की फिल्म 3 Idiots के ‘फुंसुख वांगडू’ किरदार की प्रेरणा उन्हीं से ली गई थी।
- शिक्षा सुधार और सतत विकास को लेकर उन्हें 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला।
- 2019 से ही वे लगातार लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग कर रहे हैं।
सरकार का कहना है कि हिंसा को भड़काने में उनका हाथ है। गृह मंत्रालय ने उनके NGO SECMOL और HIAL के FCRA लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। सीबीआई ने भी इन संस्थाओं के फंड की जांच शुरू कर दी है।
वांगचुक का पक्ष:
“मुझे बलि का बकरा बनाया जा रहा है। समस्या का समाधान करने के बजाय सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है। मैं गिरफ्तारी से नहीं डरता, लेकिन इससे हालात और बिगड़ेंगे।”
छठी अनुसूची क्या है और इसकी मांग क्यों?
संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्त अधिकार देती है। अभी यह असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में लागू है।
- स्वायत्त परिषदें अपनी जमीन, जंगल, परंपराएं और रीति-रिवाज सुरक्षित रख सकती हैं।
- वे स्थानीय कानून बना सकती हैं।
- बाहरी दखल सीमित रहता है।
लद्दाख की मांग है कि:
- लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले।
- छठी अनुसूची लागू हो।
- लेह और कारगिल को अलग-अलग लोकसभा सीटें दी जाएं।
- नौकरियों और संसाधनों पर स्थानीयों को प्राथमिकता मिले।
मांग क्यों तेज हुई?
2019 में धारा 370 हटने के बाद बाहरी लोग लद्दाख में जमीन और निर्माण कार्य करने लगे। स्थानीयों को डर है कि इससे पर्यावरण और उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
पहले भी कर चुके हैं आंदोलन
- फरवरी 2023: 5 दिन की भूख हड़ताल, हजारों लोग शामिल।
- जून 2023: एनडीएस स्टेडियम में बड़ा धरना।
- मार्च 2024: 21 दिन का “जलवायु उपवास”।
- सितंबर 2024: लेह से दिल्ली तक पैदल मार्च “दिल्ली चलो”।
- सितंबर 2025: मौजूदा 35 दिन का अनशन, जो हिंसा की वजह से 15 दिन में ही टूट गया।
सरकार का रुख
केंद्र का कहना है कि:
- High Powered Committee (HPC) पहले से ही वार्ता कर रही थी।
- अनुसूचित जनजातियों का आरक्षण 45% से बढ़ाकर 84% किया गया।
- महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित हुआ।
- 1800 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई।
- भोटी और पुर्गी भाषाओं को आधिकारिक दर्जा दिया गया।
लेकिन सरकार का आरोप है कि “कुछ राजनीतिक रूप से प्रेरित लोग” वार्ता विफल करना चाहते थे और वांगचुक ने “अरब स्प्रिंग” जैसे आंदोलन का हवाला देकर युवाओं को भड़काया।
हिंसा के बाद उठाए गए कदम
- लेह और कारगिल में कर्फ्यू।
- 50 से ज्यादा लोग हिरासत में।
- सभी स्कूल-कॉलेज बंद।
- गृह मंत्रालय की टीम ने लेह पहुंचकर हालात की समीक्षा की।
- स्थानीय नेताओं को 27-28 सितंबर को दिल्ली बुलाया गया।
- वांगचुक के NGO का FCRA लाइसेंस रद्द।
आगे क्या?
लद्दाख का यह आंदोलन केवल स्थानीय राजनीति नहीं है, बल्कि पर्यावरण, पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है।
- अगर सरकार और स्थानीय नेतृत्व बातचीत से समाधान निकालते हैं तो शांति लौट सकती है।
- लेकिन अगर संवाद टूटता है, तो यह असंतोष लंबे समय तक जारी रह सकता है।
The KN NEWS की राय
लद्दाख की ताज़ा हिंसा हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है। लोगों की आवाज़ सुने बिना विकास थोपना खतरनाक हो सकता है। सोनम वांगचुक और अन्य नेताओं को बलि का बकरा बनाना आसान है, लेकिन असली सवाल है — लद्दाख के लोग अपने भविष्य को लेकर कितने सुरक्षित महसूस करते हैं?

